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Surah Al-Kahf, Verse 29

وَقُلِ الْحَقُّ مِن رَّبِّكُمْ فَمَن شَاءَ فَلْيُؤْمِن وَمَن شَاءَ فَلْيَكْفُرْ إِنَّا أَعْتَدْنَا لِلظَّالِمِينَ نَارًا أَحَاطَ بِهِمْ سُرَادِقُهَا وَإِن يَسْتَغِيثُوا يُغَاثُوا بِمَاءٍ كَالْمُهْلِ يَشْوِي الْوُجُوهَ بِئْسَ الشَّرَابُ وَسَاءَتْ مُرْتَفَقًا

And say: The truth is from your Lord, so let him who please believe, and let him who please disbelieve; surely We have prepared for the iniquitous a fire, the curtains of which shall encompass them about; and if they cry for water, they shall be given water like molten brass which will scald their faces; evil the drink and ill the resting-place.

Monday, 15 May 2017

#माँ_बाप_के_साथ_किये_हुवे_बुरे_बरताओ_का_बदला

मिश्‍क़ात शरीफ़ में मरवी एक हदीस का तर्जुमा है;
"अल्लाह तआला अपनी मंशा से तमाम गुनाहों की मग़फ़िरत फ़र्मा देता है, मगर वालदैन की नाफ़रमानी और ईज़ा रसानी करने वाले को इसी दुनिया में मरने से पहले सज़ा भुगतनी पड़ती है।"
इस हदीस की तशरीह में मुहद्देसीन फ़रमाते हैं कि गुनाहों की सज़ा मरने के बाद आख़िरत में मिलेगी, लेकिन माँ बाप का दिल दुखाने वाले को सज़ा इसी दुनिया में मिलती है। और उस वक़्त तक मौत नहीं आती, जब तक बदला ना मिल जाये...।
हज़रत शाह अब्‍दुल ग़नी फूल पूरी ने अपने मलफ़ूज़ात में हदीस बयान फ़रमाकर एक वाकये का ज़िक्र किया है कि...
"एक शख़्स ने अपने बाप के गले में रस्सी बांधी और उसको घसीटता हुवा बांस के खेत के पास ले गया, जो सामने दस बीस गज़ के फ़ासले पर थे। वहाँ पहुंच कर बाप ने बेटे से कहा; "बेटा! अब इस से आगे मत खींचना वर्ना तू ज़ालिम हो जाएगा।"
"बेटा ताज्जुब से बोला; "मैंने जो ये बीस गज़ तक आपको खींचा है तो क्या अभी तक में ज़ालिम नहीं हुवा हूँ?"
बाप ने कहा; "हाँ तू अभी तक ज़ालिम नहीं हुवा, क्योंकि मैंने भी अपने बाबा, यानी तेरे दादा को इसी तरह गर्दन में रस्सी बांध कर यहीं तक खींचा था...। लिहाज़ा अब तक तो मुझे अपने अमल का बदला मिला...। अब इस जगह से अगर तू आगे बढ़ेगा तो ज़ालिम हो जाएगा...।"
क्या अजीब ढंग है..... 😏
किसी की माँ नाराज़ है....
किसी का बाप नाराज़ है...
किसी का भाई नाराज़ है....
किसी की बहन नाराज़ है....
किसी की बीवी नाराज़ है.....
किसी का शौहर नाराज़ है....
किसी के पडौसी नाराज़ है....
किसी के रीश्तेदार नाराज़ है....
किसी के दोस्त नाराज़ है.....
और लोग हैं के फेसबुक और वाॅट्सअॅप पर लोगों से माफी मांग रहे है, जिन्हें हम जानते भी नहीं हैं...।
अगर मांफी मांगनी ही है फिर होना तो ये चाहिए के उनसे माफी मांगे जो माफी के हकदार हैं, जो नाराज़ हैं...।
अल्लाह पाक हमे एक दुसरे को माफ करने कि तौफीक अता फरमाए और अल्लाह भी हम सबको माफ फ़रमाए...।
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Reviewed by Reviewer-Nameon May 17 2017
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